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घोर अंधियारी रात, घनघोर बरसा होवत राहय, नदिया उर्रा-पुर्रा अउ लइका ल धर के पार होना राहय

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घोर अंधियारी रात, घनघोर बरसा होवत राहय, नदिया उर्रा-पुर्रा अउ लइका ल धर के पार होना राहय

(जय-जोहार)। भादो के महीना, अंधियारी पाख, आठे के तिथि, घुप अंधियारी रात राहय, बादर गरजत राहय, बिजली चमकत राहय अउ घनघोर बरसा होवत राहय। रोहणी नक्षत्र म मथुरा के कारागार म वसुदेव के पत्नी देवकी के गरभ ले भगवान किसन-कन्हैया हा जनम लिन। अधर्म, अन्याय, अत्याचार के नास करे बर, धर्म अउ न्याय के स्थापना करे बर। भगवान के जनम के सुभ घड़ी के सुरता म ये आठे के तिहार मनाथंन।

कथा म बताए जाथे कि ‘द्वापर युग म भोजबंसी राजा उग्रसेन मथुरा म राज करत रिहिस। ओकर अतलंग अत्याचारी बेटा कंस हा ओला राज गद्दी ले उतार दिस अउ अपन हा मथुरा के राजा बनगे। कंस के एक बहिनी रिहिस देवकी, जेकर बिहाव वसुदेव नाम के यदुबंसी सरदार संग होईस।

कंस हा अपन बहिनी देवकी ला ओकर ससुरात बिदा करे बर जावत रिहिस। उही समय रस्ता म आकासबानी होईस- ‘हे कंस, जे देवकी ला ते हा बड़ मया ले बिदा करे बर जावत हस, उही म तोर काल बसे हे। एकरे गरभ ले होवइया आठवां बालक हा तोर बध करही।’ ये सुनके कंस हा देवकी-बसुदेव ला मारे बर दउड़ गे।

तब देवकी हा ओकर ले बिनती करिस – ‘मोर गरभ ले जउन संतान होही, ओला मैं तोर आगू लान देहूं भाई, अपन भांटों ला मारके तोला का फायदा होही?’ कंस हा देवकी के बात मानगे अउ मथुरा लहुटगे। फेर वसुदेव अउ देवकी ला जेलखाना म डार दिस। वसुदेव-देवकी के एक-एक करके सात लइका होइस अउ सातों लइका मन ला जनम लेते साठ कंस हा मार डरिस। अब आठवां लइका होवइया रिहिस। कारागार म कड़ा पहरा लगा दे रिहिस।

जे कोठरी म देवकी अउ वसुदेव कैद रिहिन, उहां अचानक अंजोर होगे, उंकर आगू संख, चक्र, गदा, पद्म धरे चारभुजा वाला भगवान बिस्नु हा परगट होगे। दूनों झन भगवान के चरण म गिर परिन। तब भगवान हा उंकर ले किहिन- ‘अब में हा फेर नवजात लइका के रूप धरत हंव। तुमन मोला इही समय अपन संगवारी नंदजी के घर बृंदाबन म अमरा दव, अउ उंकर घर जउन कन्या जनम ले हे, ओला लान के कंस ला संउप दव। ये समय बाताबरन हा ठीक नई हे, तभो ले तुमन चिंता झन करव। जम्मो पहरादार मन सुत जहीं, जेलखाना के फाटक अपने-आप खुल जही अउ बाढ़ के पानी म उफनावत जमना हा घलो पार जाए बर रस्ता दे दीही।’

ओ समय घनघोर बरसा होवत रिहिस। चारो कोती घुप अंधियारी छाए रिहिस। बालक के रूप म भगवान के अवतार होते ही वसुदेव–देवकी के बेड़ी खुल गें, कारागार के कपाट अपने-अपन खुल गे। पहरादार मन के नींद पर गे। वसुदेव जी हा बालक कन्हैया ला सूपा म धरके, मुड़ म बोहो के निकलिन। जमना जी के जलरंग पानी ला देखके घबरागें। हिम्मत करके आगू बढ़िन त बाढ़ के पानी छाती ले ऊपर होगे। पानी बाढ़ते जावत रिहिस। जमना के लहरा वसुदेव जी के मुड़ ले ऊप्पर उठे लगिस। असल म जमना जी हा भगवान के चरन छूना चाहत रिहिस। भगवान हा सूपा ले अपन पांव ला बाहिर निकालके जमना जी ला छुवा दिन, फेर का जलरंग पूरा आय जमना जी म बीचों-बीच रस्ता बन गे। भारी बरसा ले भगवान ला छाता ओढ़ाए बर खुद सेसनाग हा अपन फन काढ़ के चले लगिस। अइसे ढंग ले बसुदेव जी हा भगवान संग जमना पार होगें।

गोकुल म अपन मितान नन्द जी के घर पहुंचगे। उहाँ पर नन्द के पत्नी जसोदा हा एक कन्या ला जनम दे रिहिन। वसुदेव जी हा भगवान कन्हैया ला जसोदा करा सुता दिन अउ ओ कन्या ला लेके चले गिन। कंस हा ओ कन्या ला मार डारे बर भुंइया म पटकिस, लेकिन ओ तो माया रिहिस, कंस के हाथ के छूटके आसमान म उड़ागे। अउ अट्‌टाहास करत किहिस – ‘कंस तोर बध करने वाला तो गोकुल पहुंचगे हे।’

कंस हा गोकुल के जम्मो नान्हें लइका मन ला मारे के हुकुम दे दिस। गोकुलवासी मन ऊपर कई किसम ले अत्याचार करे बर लगिस। बालक कन्हैया ला मारे बर कतको झन बड़े-बड़े राक्षस मन ला भेजिस, लेकिन कन्हैया हा सबो राक्षस मन ला मार डरिस। अउ अंत म अत्याचारी कंस ला मार डरिस।

भगवान कृस्न हा बिस्नु जी के आठवां अवतार माने जाथें। जउन हा बिस्नु भगवान के सोलह कला मन ले भरे अवतार हें। भगवत गीता म जउन उपदेस दे हें, ओहा जनमानस बर जिनगी के दरसन आय, जिनगी के रस्ता आय। धरम के रस्ता म चलन अउ फल के चिंता करे बिना अच्छा करम करत चले चलन। इही भगवान के सीख ए।

(प्रस्तुति-ललित मानिकपुरी, महासमुंद)

 

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